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टेलीविज़न और सिनेमा की जानी-मानी अदाकारा सुरेखा सिकरी, जो हिंदी टेलीविज़न शो ‘बालिका वधु’ में दादीसा का किरदार निभाकर मशहूर हुई, अपने 40 साल लम्बे और शानदार एक्टिंग कैरियर के लिए जानी जाती हैं। उनके कैरियर की शुरुआत 1978 में एक राजनीतिक नाट्य ‘किस्सा कुर्सी का’ से हुई और अपने अब तक के सफर में टेलीविज़न पर कुछ प्रभावशाली किरदार अदा कर के वे दो नेशनल अवॉर्ड जीत चुकी हैं।

अब उन्होंने आने वाले मनोरंजक फिल्म ‘बधाई हो’ में अपने हास्यास्पद डॉयलाग से सनसनी फैला दी है। इस फिल्म में आयुष्मान खुराना, सान्या मल्होत्रा और नीना गुप्ता भी हैं।

अक्टूबर 19 को आने वाली ये फिल्म एक मिडिल-क्लास परिवार पर आधारित है जिसमें एक बुज़ुर्ग दंपत्ति प्रेग्नेंट हो जाते हैं और फ़िल्म में ये परिवार इस नाज़ुक विषय को संभालते हैं। हैप्पी एजिंग ने सुरेखा सिकरी से उनके इस फ़िल्म और स्वास्थ्य के विषय पे बात कि!

आइए अब पढ़ें उनके साथ साक्षात्कार में से कुछ विशेष बातें:

बधाई हो ने छुआ है कुछ बहुत नाज़ुक विषयों को जैसे प्रेगनेंसी और बुज़ुर्ग दम्पत्तियों में सेक्स। जब आपने स्क्रिप्ट सुनी तब आपकी क्या प्रतिक्रिया रही?

 बधाई हो एक बेहतरीन तरीके से लिखी हुई स्क्रिप्ट है, जो मुझे बेहद पसंद आयी। यह कहानी है एक मिडिल-क्लास परिवार के बारे में जो दिल्ली में रहती है। मेरा किरदार एक बूढ़ी औरत का है जो पारम्परिक और पुराने विचारों की है और वे घर के मुख्य आदमी की माँ है जो थोड़े नए विचारों वाले हैं और कविता-प्रिय हैं। मेरे किरदार को अचानक पता चलता है की उनकी 50+ उम्र वाली बहु गर्भवती हैं और वे चकित हैं ये सोचकर कि लोग क्या कहेंगे और वे बाहरी दुनिया का सामना कैसे करेंगे। फिल्म ने इस परिस्थिति को बड़े ही मज़ाकिया और प्यारे तरीके से पेश किया है। फिल्म में एक बुज़ुर्ग दंपत्ति के बीच यौन सम्बन्ध होने के विषय को सरल और मज़ेदार तरह से दर्शाया गया है।

बुज़ुर्ग दंपत्ति का प्रेग्नेंट होना: क्या समय आ गया है की हम इन वर्जित विषयों पर खुल कर बात करें?

हाँ, बिल्कुल ऐसी परिस्थितियाँ वाकई में होती हैं। कुछ समय पहले एक प्रमुख दैनिक अखबार में एक दंपत्ति के बारे में एक लेख छपा था | जो बिहार स्थित एक छोटे गाँव के निवासी थे और उस 39 वर्ष की महिला, जो इस उम्र में ही दादी बन चुकी थी, को पता चलता है कि वह गर्भवती हैं। वे दंपत्ति इस बात से इतना शर्मिंदा हुए कि उन्होंने आत्महत्या कर ली।  

समय आ गया है की बुज़ुर्ग दंपत्ति का गर्भवती होने के मसले को एक शर्मिंदगी से बदल कर समाज का स्वीकारयोग्य विषय बनाए।

आजकल पहले से ज़्यादा खुल्ला माहौल है। सेक्सुअली एक्टिव बुज़र्ग दम्पत्तियों जैसे विषयों को हम पहले से ज़्यादा बढ़ावा देते हैं और स्वीकारते हैं। मैं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि लोग इस विषय को सराहेंगे और ज़्यादा खुल जाएंगे।

आप 70 के दशक से ही काफी सक्रीय रही हैं और काम में लगी हुई हैं। क्या आप ने समय के साथ तनाव के स्तर को बदलते हुए देखा है?  

“तनाव का स्तर सही मायने में बढ़ गया है। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मुश्किल हो गई है। आज कल हर चीज़ में अनिश्चितता बनी हुई है।”

तनाव का स्तर सही मायने में बढ़ गया है। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मुश्किल हो गई है। आज कल हर चीज़ में अनिश्चितता बनी हुई है। लोग हमेशा ऑफिस पर पहुँचने की भागमभाग में लगे रहते हैं। ज़िन्दगी तनावग्रस्त हो गई है। पर लोग दृढ़ होते हैं, तरीके और युक्तियाँ ढूँढ ही लेते हैं जिससे तनाव को झेलते हुए आगे बढ़ते जाना उनके लिए संभव होता है।   

पुराने ज़माने में चीज़ें ज़्यादा सुखद और आसान हुआ करती थी। चीज़ें धीमी गति से आगे बढ़ती थी। हमें एक फ़ोन करने के लिए भी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, उन दिनों ट्रंक कॉल्स हुआ करते थे। आज कल हर चीज़ बड़ी ही तीव्र गति से आगे बढ़ रही हैं। इंसान को थोड़ा रुक कर अपने जीवन और स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना चाहिए।

क्या आप सोचती हैं कि लोग अपने स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं और ऐसा क्यों?    

“‘डायट’ या सही तरह का खानपान को स्कूली शिक्षा का एक हिस्सा बनाने चाहिए।”

हाँ, 30s और 40s की उम्र के लोगों को बहुत से स्वास्थ्य संबंधी कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। लोग हर तरह के खाना खा रहे हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। उन्हें इस चीज़ की समझ नहीं कि क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। मुझे यह लगता है ‘डायट’ या सही तरह का खानपान को स्कूली शिक्षा का एक हिस्सा बनाने चाहिए। लोगों को पता होना चाहिए किस खाने में कौन सा पोषण है और आप कैसे उनके और अपनी फिटनेस के बीच संतुलन बना सकते हैं। ये मूल शिक्षा का एक हिस्सा होना चाहिए। उनको समझना पड़ेगा गलत खानपान के क्या हानिकारक नतीजे होते हैं।

आप पिछले 4 दशकों से काम कर रही हैं, आप अपने काम और निजी ज़िन्दगी को कैसे संभालती हैं?

“मुझे अपने काम से बेहद प्यार है और इस भाव से मुझे शक्ति मिलती है।”

मैं इसलिए संभाल पाती हूँ क्योंकि मैं अपने काम से प्यार करती हूँ। मुझे अपने काम से बेहद प्यार है और इस भाव से मुझे शक्ति मिलती है। इसमें मुझे दिमाग से, तन से, और मन से रूचि है। ये मुझे आकर्षित करता है। जब मैं कोई किरदार निभाती हूँ, मुझे दिलचस्पी रहती है ये जानने में कि वह किरदार कहाँ से आई है, उसकी अंदरूनी सोच क्या है, उस किरदार की मनोवृत्ति क्या है और मैं जहाँ भी जाती हूँ, अपने चारों ओर बहुत सारे लोगों को बड़े ध्यान से देखती हूँ। इसलिए, सक्रिय रहना और काम करना मुझे खुशहाल बनाए रखता है।

इस उम्र में अपने आप को फिट रखने के लिए, क्या आप कोई हेल्थ रेजीम का पालन करती हैं?

मुझे योग और आयुर्वेद में विश्वास है।  

अगर फिट रहने की बात करें तो ख़ास कर बुज़ुर्गों में फिटनेस से परे रहने की भावना क्यों है?

“रिटायरमेंट वन-प्रस्थ आश्रम से जुड़ी पुराने ज़माने की सोच है।”

मैं सोचती हूँ की यह पुराने ज़माने की सोच है जो वन-प्रस्थ आश्रम और रिटायरमेंट से जुड़ी धारणाओं से आई है। एक बेकारी की भावना रिटायरमेंट शब्द के साथ जोड़ दी गई है। क्यों करें इस शब्द का उपयोग?

आप सारी उम्र काम कर रहे हैं। आप अपने दिमाग का इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर आप एक नियमित जॉब के आदी हैं और जब वह आपके हाथ से चली जाती है, आप एक आदत को तोड़ रहे हैं और यही डिप्रेशन का कारण बनता है।  

तो लोगों को रिटायरमेंट के बाद अपने आप को कैसे व्यस्त रखना चाहिए?  

“बस आप जो कर रहे हो उसमें दिलचस्पी रखें।”

बस आप जो कर रहे हो उसमें दिलचस्पी रखें। ऐसा समझें जैसे एक आदत छूट गई है और अब हमें नई आदतें बनानी है अपने आप को व्यस्त रखने के लिए। आप ‘गार्डनिंग’ कर सकते हैं, किताबें पढ़ सकते हैं, लेख लिख सकते हैं या एन जी ओ में लोगों की मदद कर सकते हैं।

“बुज़ुर्गों का टेक्नोलॉजी के प्रति रुझान होना चाहिए, उन्हें कंप्यूटर और मोबाइल फ़ोन चलाना सीखना चाहिए।”

एक इंसान हज़ारों चीज़ें कर सकता है, पर उसकी मानसिकता भी वैसी होनी चाहिए। कुछ मिडिल-क्लास लोग आर्थिक कठिनाइयों की वजह से हार मान लेते हैं और पूरे जीवन बच्चों को बड़ा करने का संघर्ष करने के बाद जीवन उनके लिए काफी संघर्षमयी हो जाता है। इसलिए वे रिटायरमेंट के बाद आराम करना पसंद करते हैं। यह भी ठीक ही है। बस ये हारी हुई भावना नहीं होनी चाहिए।

हमारे देश में सीनियर सिटिज़न के लिए हेल्थ्केयर को आप किस तरह बदलते हुए देखती हैं?

अपने स्वास्थ्य-सम्बन्धी चयन के प्रति लोगों का शिक्षित होना ज़रूरी है और इसमें उम्र मायने नहीं रखती। ज़रूरी है कि वे स्वास्थ्य के प्रति अपने लापरवाह रवैये को बदलने पर काम करें। सरकार को खाने की चीज़ो में पेस्टिसाइड के प्रयोग पर नियंत्रण करना चाहिए। उन्हें ऑर्गनिक फ़ार्मिंग और स्वस्थ खानपान को बढ़ावा देना चाहिए।

अगली पीढ़ी के लिए आपका कोई सन्देश है?

“अच्छा स्वास्थ्य एक खुशहाल चित्त बनाता है।”

निवेदन है कि आप स्वच्छ खाना खाएं और हमेशा सच बोलें। और याद रखें – अच्छा स्वास्थ्य एक खुशहाल चित्त बनाता है।

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