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डिमेंशिया (dementia) या स्मृतिभ्रंश मस्तिष्क का एक ऐसा विकार है जिसमें व्यक्ति अपने अतीत को, अपने वर्तमान को यहां तक की रोज़ाना की जानेवाली गतिविधियों को भी भूल जाता है| जाहिर सी बात है, ऐसा व्यक्ति अपने करीबी रिश्तेदार, अपने परिवार के सदस्य और सभी पहचान के लोगों को याद नहीं कर पाता|

भारत में स्मृतिभ्रंश को बहुत हल्के में लिया जाता है| इसका शिकार बनने वाले लोगों की सेवा नहीं की जाती, बल्कि इसे उम्र के साथ आने वाली बीमारी मानकर नजरअंदाज किया जाता है| इसलिए आज हम आपके साथ एक ऐसी कहानी साझा करने जा रहे है, जो आपको स्मृतिभ्रंश के बारे में सोचने पर मजबूर कर देगी|

स्वप्ना किशोरे की माता को ‘स्मृतिभ्रंश’ हुआ था और इस बात का स्वीकार करना स्वप्ना के लिए अत्यंत कठिन था| इंटरनेट पर भी स्मृतिभ्रंश के उपचारों के बारे में कोई खास जानकारी न थी| 

स्मृतिभ्रंश का निदान

सन २०११ में जब स्वप्ना की माता को स्मृतिभ्रंश की समस्या का निदान किया गया तब इस बीमारी के बारे में समाज में नकारात्मक भावनाएं थी| लोगों का ये मानना था कि  स्मृतिभ्रंश से बचने के लिए स्वप्ना की माता को दैनंदिन गतिविधियों में व्यस्त रहना चाहिए था| परन्तु, स्वप्ना की माता शारीरिक और मानसिक रूप से हमेशा व्यस्त ही रहा करती थी| क्यूंकि वे ३ बार एम्ए कर चुकी थी, यह बात उनको लागु नहीं हो सकी|

कुछ प्रगत देशों में स्मृतिभ्रंश को गंभीरता से लिया जाता है / परन्तु, उपहासात्मक रूप में भारतीय समाज का ये मानना है, कि सिर्फ निष्क्रिय लोगों को स्मृतिभ्रंश होता है /

माता की देखभाल

स्वप्ना की माता दिन-बदिन अपनी स्मृति खोने लगी थी| सिर्फ उनकी देखभाल करने वाले लोग ही उनको याद थे| उस समय स्मृतिभ्रंश के मरीज की देखभाल करने के लिए कोई जानकारी इंटरनेट पर न होने की वजह से स्वप्ना ने निर्णय लिया कि वो खुद की ब्लॉग और यूट्यूब के जरिए इस विकार के बारे में अधिक जानकारी देगी और माता के बारे में अपने अनुभवों को साझा करेगी|

उनके माता की देखभाल करना दिन-प्रतिदिन मानसिक और शारीरिक रूप से चुनौती बनता जा रहा था| उनको चलना, खाना आदि छोटी छोटी चीजे करना भी एक कठिन काम लगने लगा था| अब वे लोगों के सवालों के जवाब ‘हां’ या ‘ना’ में देने लगी थी|

उन्होंने अपने माता के लिए पहेलियां, बच्चों के लिए बने छोटे-छोटे गेम्स, कहानियों की किताबें आदि चीजें लाकर रखी थी पर उनके माता ने पहले स्वप्ना की इस हरकत का विरोध किया| परन्तु, कुछ समय बाद उनकी माता उन चीजों को अपनाने लगी|

स्मृतिभ्रंश का आखरी दौर

स्मृतिभ्रंश प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है| धीरे धीरे बढ़ने वाले स्मृतिभ्रंश के लक्षणों को पहचानना भी बहुत कठिन है| आपके परिवार का सदस्य जो स्मृतिभ्रंश से जूझ रहा हो, आपके सवालों के जवाब देना बंद कर देता है| इस लक्षण से स्मृतिभ्रंश को पहचानने में आपको आसानी होगी| स्वप्ना की माता के साथ भी बिलकुल यही हुआ| उनके माता की देखभाल करनेवाले उनके प्रतिक्रिया का इंतजार करते रहते थे परन्तु उन्हें कोई जवाब न मिलता|

देखभाल करनेवाले की नियुक्ति

अब स्वप्ना ही अपने माता की देखभाल करने लगी थी| उनकी माता के अजीब बर्ताव की वजह से अगर देखभाल करनेवाला कोई व्यक्ति मिलता तो थोड़े दिनों में आना बंद कर देता|  दूसरी तरफ स्वप्ना की माता खुद ही  देखभाल करनेवाले की जरूरत को नहीं समझ पा रही थी अतः इस बात के खिलाफ थी और ये सोचती थी कि बेटी होने की जिम्मेदारी को स्वप्ना नहीं पूरा कर पा रही है|

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भारत में देखभाल करने के लिए एक प्रशिक्षित व्यक्ति का मिलना तब बहुत ही मुश्किल था| अत्यधिक प्रयास करने पर मिलनेवाले व्यक्ति को स्मृतिभ्रंश की बीमारी की वजह से डरावनी धमकियां देकर स्वप्ना की माता भगा देती| स्वप्ना काम के लिए बाहर जानेवाली स्वप्ना को नौकरी छोड़कर माता का ख्याल खुद ही रखने के अलावा कोई विकल्प नही दिख रहा था|  आख़िरकार एक नए व्यक्ति को स्वप्ना स्मृतिभ्रंश के डे केयर सेंटर में ले गई और उस व्यक्ति ने वहां सीखा कि स्मृतिभ्रंश के मरीज की देखभाल कैसे की जाती है| इस पैंतरे ने स्वप्ना की सहायता की|

अगर आपको कोई प्रशिक्षित व्यक्ति मिले तो भी आपको मरीज के स्वभाव और बर्ताव के बारे में उस व्यक्ति को अधिक जानकारी देनी चाहिए /

कैसे स्वप्ना के ब्लॉग्स और वीडियोज कर रहे हैं दूसरों की मदद?

स्वप्ना को लोगों की सहायता करना अच्छा लगता है और उन्हें वास्तव की जानकारी भी है| वे ये जानती हैं कि उन्हें अपने अनुभव ज्यादा से ज्यादा साझा करने चाहिए ताकि किसी को इस परिस्थिति से गुजरना पड़े उनको इस बारे में पता हो|

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dementia treatment
चित्र प्रातिनिधिक स्वरुप में

स्वप्नाने उन ब्लॉग्स में ये अनुमान भी लिखा है कि उनकी माता इस परिस्थिति के बारे क्या सोचती होगी, उनको भय, दर्द, गुस्सा, असहायता और डिप्रेशन आदि तकलीफों का सामना करना पड़ता होगा| इन ब्लॉग्स और वीडियोज के जरिए स्वप्ना ने अभ्यासपूर्ण जानकारी लोगों के सामने लायी है| इसके लिए उन्होंने डिमेंशिया के मरीज की देखभाल करनेवाले अन्य लोगों के साथ भी संपर्क किया| अब उन्होंने इन ब्लॉग्स को हिंदी में भाषांतरित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ये जानकारी पहुँच सके|

सन २०१२ में स्वप्ना की माता का निधन हुआ। १० सालों से भी अधिक समय तक स्वप्नाने उनकी देखभाल स्वयं ही की थी| आईआईटी और आईआईएम से शिक्षा लेकर उन्हें जो नौकरी मिली थी वो उन्होंने अपने माता के सेहत का ध्यान रखने के लिए त्याग दी|

भारत में ४ दशलक्ष से भी अधिक बुजुर्ग स्मृतिभ्रंश का शिकार बने हैं| उनकी देखभाल करनेवालों के लिए और आनेवाली कई पीढ़ियों के लिए स्वप्ना ने स्वयं बनाए हुए ये  काम ब्लॉग्स और वीडियोज काम आएंगे| स्वप्ना के ब्लॉग्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें| यहां क्लिक करके भी आप डिमेंशिया के बारे में अधिक जानकारी ले सकते हैं| स्वप्ना ने जो वीडियोज बनाएं हैं  उन्हें देखने के लिए यहां क्लिक करें|

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Ask a question regarding क्या आप डिमेंशिया (Dementia) के मरीज की देखभाल कर रहे हैं? तो ज़रूर पढ़ें यह ब्लॉग

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