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भारत में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार ७० साल से अधिक उम्र की जनसंख्या के ५० प्रतिशत नागरिकों में गंभीर स्वरुप के विकार पाए गए हैं जिनके लिए सर्जरी की आवश्यकता है| सर्जरी से पहले और बाद में अगर सही कदम न उठाए गए तो सर्जरी के दौरान समस्याएं जटिल रूप में सामने खड़ी हो सकती हैं| हालाँकि हर व्यक्ति की शारीरिक अवस्था के अनुसार अलग अलग तरह की समस्याएं आ सकती है| यह समस्याएं व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, विकार की गंभीरता, सर्जरी का प्रकार, व्यक्ति की दवाइयों और इलाज को प्रतिक्रिया देने की क्षमता एवं मानसिक स्थिति इन पहलुओं पर निर्भर करता है|

सामान्य तौर पर सर्जरी के दौरान आने वाली समस्याएं:

1. दौरा/ झटका: किसी भी मरीज में सर्जरी के दौरान ब्लड प्रेशर कम होने के कारण दौरा या झटका आ सकता है| सामान्य रूप से ऐसा होने पर सर्जन रक्त के बहाव में रूकावट लाते हैं, ब्लैंकेट में मरीज को लपेट कर शरीर की गर्मी को बनाए रखते हैं, धमनियों में तरल पदार्थ या रक्त भरते हैं, मरीज को ऑक्सीजन देते हैं और दवाइयों से मरीज को ठीक करने की कोशिश करते हैं|

2. ब्रेन हेमरेज: हेमरेज का मतलब है खून का बहाव| जिस अवयव की सर्जरी की जा रही हो वहा से सर्जरी के दौरान रक्त निकलने की सम्भावना रहती है| इसकी वजह से मस्तिष्क को पर्याप्त रक्त नहीं मिल पाता| परिणाम स्वरुप मरीज को ब्रेन हेमरेज हो सकता है| ऐसी परिस्थिति में डॉक्टर सलाईन के जरिए मरीज के शरीर में तरल पदार्थों की कमी को भरने की कोशिश करते हैं या रक्त चढ़ाते हैं|

3. घाव में संक्रमण: सर्जरी के दौरान अवयव का अंधरुनि हिस्सा खुला रह जाता है और बैक्टीरियाज इसमें आसानी से प्रवेश कर सकते हैं| घाव में हुए संक्रमण के कारण घाव के आसपास के अंधरुनि अवयवों पर भी असर होने की आशंका रहती है| घाव में संक्रमण होने पर डॉक्टर अक्सर एंटीबायोटिक्स देते हैं या फिर घाव पर आये हुए फोड़े को हल्का चीरा देकर उस अवयव को कीटाणुरहित करते हैं|

4. डीप वेन थ्रोम्बोसिस : जब शरीर की भीतरी नसों में खून जम जाता हैं तब उस अवस्था को डीप वेन थ्रोम्बोसिस कहा जाता है| जब खून के बड़े चक्के का हिस्सा चक्के से अलग होकर ह्रदय की तरफ जाने वाली धमनी में प्रवेश करता हैं, तो खून के बहाव में रूकावट आकर मरीज को दिल का दौरा पड़ सकता है| डॉक्टर ऐसे मामलों में मरीज की जाँच कर ये पता लगाते हैं की ऐसे खून के चक्के शरीर में कितने हैं और कहा स्थित हैं| यह पता लगाने के बाद ही चक्के न बने इसलिए एंटीकॉग्यूलेन्ट दवाई तथापि क्लॉट्स को गलाने के लिए थ्रोम्बोलायटिक दवाई देते हैं| इससे कम न हो जाने पर डॉक्टर सर्जरी करके डीप वेन थ्रोम्बोसिस का इलाज करते हैं|

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5. फेफड़ों की जटिल स्थिति: सर्जरी से पहले ४८ घंटों में लम्बी साँस न लेने पर फेफड़ों में जटिल स्थिति उत्पन्न होती है| यह श्वसन मार्ग में भोजन के कण, पानी, रक्त फँसने की वजह से या निमोनिया के कारण होता है| अगर सर्जरी से पहले आपको छाती में घरघराहट, दर्द महसूस हुआ या बुखार, खांसी जैसे लक्षण दिखें तो सर्जन से ये बात छुपाएं नहीं|

6. पेशाब में अवरोध: मरीज को सर्जरी से पहले दर्द का एहसान न हो इसलिए एनेस्थेशिया (संवेदना कम करने के लिए इंजेक्शन) दिया जाता है| इसके परिणाम स्वरुप मूत्र संस्था की संवेदना भी कम हो सकती है अतः मरीज को पेशाब के दौरान अवरोध महसूस होना या मूत्राशय पूरी तरह से खाली न कर पाना आदि समस्याओं का सामना करना पड़ता है| इस अवस्था को नियंत्रण में लाने के लिए डॉक्टर पेशाब का कार्य नियंत्रण में आने तक कैथिटर (पेशाब के लिए थैली) लगाते हैं|

7. एनेस्थेशिया का दुष्प्रभाव: यह समस्या बहुत ही कम मरीजों में पायी जाती है| सर्जरी के दौरान जो एनेस्थेशिया दिया जाता है, उसका दुष्प्रभाव सिर हल्का होना या लिवर में विषैले घटक पाए जाना आदि प्रकारों में दिखाई देने की सम्भावना होती है|

सर्जरी से पहले ही शरीर की पूरी तरह से जाँच करने से इन समस्याओं को टाला जा सकता है|

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