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क्या है हैल्युसिनेशन (Hallucination)?  मोहमाया, मनोभ्रम, भ्रांति, वहम, हैल्युसिनेशन, डिल्यूजन आदि शब्द हम मज़ाक में इस्तेमाल करते रहते हैं। पर अगर सचमुच हमें ऐसी चीज़ें दिखने लगें जो वास्तविकता में ना हो तो? जी हाँ, ये भी संभव है। मतिभ्रम, भ्रांति  या हैल्युसिनेशन में अक्सर ऐसा होता है।

खासकर बुजुर्ग व्यक्ति को हैल्युसिनेशन की वजह से ऐसी चीज़ें दिखाई या सुनाई देने लगती हैं जो वास्तविकता में नहीं हैं। उन्हें ये वहम भी हो सकता हैं की उनकी जान को खतरा है। ज्यादातर मामलों में वे ऐसे काल्पनिक व्यक्ति को देख सकते हैं और आवाज भी सुन सकते हैं। उन्हें ये समझाना लगभग मुश्किल होता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो उन्हें हानि पहुंचाए।

दूसरी ओर हैल्युसिनेशन का सुखद असर भी पड़ सकता है। ऐसे में वे किसी करीबी व्यक्ति को जो कि अब इस दुनिया में नहीं है, अपने पास महसूस कर सकते हैं।

कुछ सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में औसत उम्र 69 के 31% एवं 78 के 32.8% वरिष्ठ नागरीकों में हैल्युसिनेशन की बिमारी पायी गयी है|

आखिर हैल्युसिनेशन में होता क्या है? और कैसे आप अपने परिजनों में इस बीमारी को पहचान सकते हैं? कैसे देख-भाल कर सकते हैं किसी हैल्युसिनेशन के मरीज़ की? आइये देखते हैं एक सत्य घटना के जरिए:

विजया का परिचय

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ये कहानी है विजया (बदला हुआ नाम) की। यह बात हैं 1960 के दशक की। विजया एक पढ़ी-लिखी लड़की थी जिसका विवाह एक गांव में किया गया था। विवाह के पश्चात विजया ने एक लड़की को जन्म दिया। परन्तु कुछ पुराने विचारों की बुनियाद पर विजया  के ससुरालवालों ने उन्हें घर से बेदखल कर दिया। अपनी बेटी को लेकर विजया जो की एक स्वंतंत्र विचारों वाली महिला थी, अब शहर आ चुकी थी जहाँ उनके ३ भाई रहते थे। आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण विजया अपने लिए एक खुबशुरत घर बना पायीं और अपने भाइयों के नज़दीक ही रहने लगीं। ये वो जमाना था जब औरतों का घर से बाहर निकलना अस्वीकार्य था। परन्तु सुशिक्षित विजया आत्म-निर्भर थी और वे एक स्कूल में शिक्षिका के रूप में पढ़ाने लगीं।

दो साल बाद उनकी बेटी का देहांत हो गया। विजया के जीने की उम्मीद बेटी के साथ ख़त्म सी हो गयी थी। अब वे अपना ज़्यादातर समय अपने मंजले भाई और उसके परिवार के साथ बिताने लगी। उन्ही के साथ विजया ने जॉइंट अकाउंट भी खोला अपने पैसो को सेव करने के लिए। उन्होंने अपना सारा सोना मंजले भाई के बच्चों को दे दिया। शायद वही समय रहा होगा जब मंजले भाई और उसके परिवार के मन में लोभ घर कर गया। जैसे जैसे समय बीतता गया वे विजया के साथ दुर्व्यवहार करने लगे और दूरियां बनाने लगे। मंजले भाई की पत्नी कई बार विजया को घर में आने से मन कर देती।

अकेलापन और भय

रिटायरमेंट के बाद विजया काफी समय अकेले अपने घर में बिताने लगी। वे काफी पूजा पाठ किया करती थी। परन्तु उन्हें आये-दिन भय का एहसास होने लगा। जब भी उन्हें घर में अकेला एवं भयभीत महसूस होता वे अपने भाइयों के घर चली आती। क्युकी उन्होंने मंजले भाई को करीबी समझा था, वे ज़्यादातर उनके घर आती, परन्तु उनकी पत्नी इन्हे घर से निकाल दिया करती थी। कई बार तो देर रात भी। ऐसे में वे विकास (बदला हुआ नाम) जो की भाइयों में सबसे बड़े थे, उनके घर आती। विकास उन्हें समझा बुझा कर उनका डर दूर करने की कोशिश करते।

काल्पनिक व्यक्ति से डर

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धीरे धीरे यह भय किसी काल्पनिक व्यक्ति के आभास में बदलने लगा। उन्हें अपने आस पास एक व्यक्ति नज़र आने लगा। उस व्यक्ति को वे ‘बाला’ कहां करती थी और सबसे कहती कि, “बाला मुझे मार रहा है,” “बाला मेरा पीछा कर रहा है”। सबने उन्हें ये कहने की कोशिश की, कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है परन्तु विजय विश्वास नहीं कर पाती थीं।

एक बार उन्होंने घर के सामने रहने वाले व्यक्ति को पुकारा और कहां, “बाला मेरे छोटे भाई के पीछे पड़कर पिटाई कर रहा है और इसलिए मेरा छोटा भाई कार के नीचे छिपकर बैठा है। मेरे भाई को बचाओ।” ऐसा कई बार हुआ कि विजया को बाला के होने का वहम हुआ और वे डर गयी। समय के साथ यह डर बढ़ता गया और वे हर जगह स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगी।

विकास बताते हैं की ऐसा होने पर वे या उनके परिवार वाले या उनके छोटे भाई रमेश (बदला हुआ नाम) अब ये समझ चुके थे की विजया को समझाना मुश्किल है। वे अब विजया को समझा दिया करते की, ‘बाला’ चला गया है।

विकास बताते हैं की उस समय भारत में इस मानसिक बीमारी के बारे ज्यादा जागरूकता नहीं थी। ज़्यादातर या तो इसे उम्र से होने वाले मानसिक रोग या पागलपन कह कर रफा-दफा कर दिया जाता था। कई बार तो छोटे शहरों में ऐसे अनुभवों को भूत-प्रेत से भी जोड़ा जाता था। सच कहें तो आज भी मानसिक ब्मारियों को लेकर लोगों में हिचकिचाहट हैं। कई बार समाज में बदनामी या उपहास होने के डर से ऐसी मानसिक बीमारी को गुप्त रखा जाता है।

मरीज के साथ दुर्व्यवहार 

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विकास बताते हैं की विजया के मंझले भाई उन्हें एक बार नज़दीकी पागलखाने के मनो-चिकित्सक के पास परामर्श करने ले गए, परन्तु कोई उचित उपचार नहीं मिला। फिर झुंझलाकर एक दिन मंझले भाई ने उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया और उनके अनेकोबार चिल्लाने पर भी उन्हें बाहर नहीं निकाला। इससे विजया पर काफी गहरा असर हुआ। मंजला भाई और उनकी पत्नी विजया को उचित आहार भी नहीं देते थे। सुबह शाम कॉर्न-फ्लैक्स दे दिया करते थे। विजया के बाकी भाइयों को इस दुर्व्यवहार की बात काफी दिन तक पता नहीं चली। जब ये बात विकास को पता चली तो उन्होंने बहन को अपने घर लाया और उनके मन अनुसार भोजन एवं आहार उन्हें दिया। विकास ने विजया का पसंदीदा हलवा भी बनाकर उन्हें खिलाया।

बढ़ती उम्र के कारण कई अन्य बीमारियों ने विजया को घेरा और दवाइयों के असर से उनका शरीर चेतनाशून्य होता गया। उनका चलना फिरना पूरी तरह से बंद हुआ। अब वे अपने स्वयं के घर में रहती, जहाँ उनके भाई आते जाते उन्हें देख लिया करते थे। बाला को लेकर उनके मन में जो भय था वह भी धीरे धीरे ख़त्म हो गया। अब वे बाला को महसूस तो करती पर उससे डरती नहीं थीं।

आखरी सांसे 

अब धीरे धीरे उनकी शारीरिक हालत कमज़ोर होती गयी। वे बिस्तर-ग्रस्त होती चली गयी, जिसके कारण उन्हें बेड-सोर्स हो गए। मंजले भाई ने उनके उपचार के खर्चा को बे-फ़िज़ूल समझ कर उनका उचित उपचार नहीं कराया, यहाँ तक की डॉक्टर को भी आने से मना कर दिया। विजया के जख्म ख़राब होने लगे और उनसे बदबू आने लगी। अक्सर विजया की देखरेख के लिए जानेवाले विकास को जब यह बात पता चली तब उन्होंने वापिस डॉक्टर को आने के लिए कहा। और उनके छोटे भाई रमेश ने उनकी  देखभाल के लिए सेवक  नियुक्त किया। विकास के पुत्र भी अक्सर भुआ को देखने और उनकी पट्टी करने चले जाते।

विजया बोहोत कमज़ोर हो चुकी थी और उनका शरीर शिथिल पड़ चूका था। उसी दौरान विकास को किसी काम से दूसरे शहर जाना पड़ा। जब उन्होंने यह बात विजया से कहीं तो उनको इस बात से दुख हुआ और सदमा लगा। विकास तो चले गए मगर विजया ने अपने प्राण त्याग दिए।

विकास ने भारी मन से HappyAging को बताया की देश में हैल्युसिनेशन जैसे मानसिक रोगों के बारें में काफी काम जागरूकता है। अगर सही समय पर सही इलाज और जानकारी मौजूद होती और अगर उचित क्येयर-गिविंग की सुविधा एवं मार्गदर्शन मिला होता तो शायद विजया को इतने गंभीर दौर से न गुज़ारना पड़ता।

क्या आप भी हैल्युसिनेशन के मरीज की देखभाल कर रहे हैं

कई बार इस बीमारी के बारे में न जानते हुए हैल्युसिनेशन को पागलपन समझकर गलत उपचार किए जाते हैं। इन कारणों की वजह से न जाने कितने मरीजों को सही इलाज नहीं मिलता है।

सही दवाइयां और कॉग्निटिव्ह बिहेवियरल थेरपी (Cognitive Behavioural Therapy) से हैल्युसिनेशन की तीव्रता कम हो सकती हैं और ये ठीक हो सकता है। हैल्युसिनेशन में मरीज को ज्यादा प्यार और विश्वास की जरुरत होती है। ऐसे मरीजों की बातों को अनसुना न करें। हैल्युसिनेशन के प्रारंभिक लक्षण दिखने पर तुरंत ही न्यूरोलॉजिस्ट (Neurologist) या मनोचकित्सक (Psychiatrist) से इलाज कराएं और ऐसे दर्दनाक अंत से अपने प्रियजनों को बचाएं।

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