देखें: ७० वर्षीय उद्योगपति प्रकाश धोका ने स्मृतिभ्रंश (Dementia) के सैकड़ों मरीजों को दिया नया जीवन

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“I always wondered why somebody doesn’t do something about that. Then I realized ‘I was somebody’.” – Lily Tomlin

सामाजिक कार्य (Social Work) पर आधारित उपरोक्त पंक्ति हमें ये एहसास दिलाती है कि ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए किसी का इंतजार न करें बल्कि खुद ही जाकर मदद करना शुरू करें। इसी को ध्यान में रखते हुए हैप्पी एजिंग ने पुणे के जाने माने उद्योगपति प्रकाश धोका (Prakash Dhoka) से मुलाकात की। प्रकाश धोका का कार्य इतना बड़ा है कि उसे शब्दों में साझा करना मुश्किल है।

उन्होंने पुणे के नामांकित सीओईपी (COEP) कॉलेज से इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रॅज्युएशन (मैटालर्जी) का अभ्यास पूरा किया। वे डेक्कन चेंबर ऑफ़ कॉमर्स इंडस्ट्री एंड एग्रीकल्चर (DCCIA) के अध्यक्ष एवं इंडस्ट्रियल मेटल पाउडर्स (I) के मैनेजिंग डिरेक्टर (Managing Director) है। ७० साल कीउम्र में इतना व्यस्त रहने के बावजूद भी सामाजिक कार्य के लिए वे हमेशा आगे रहते है। उन्होंने स्मृतिभ्रंश (dementia) के सैकड़ों मरीजों को एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए सुविधाएं प्रदान की हैं। हैप्पी एजिंग की तरफ से हम उनके कार्य को इसलिए लोगों के साथ शेयर करना चाहते हैं क्योंकिबढ़ती उम्र के सामने हार मानने वालों के लिए उनका जीवन अत्यंत ‘प्रकाश’दायी है।

कैसे एक उद्योगपति ने चुना सामाजिक कार्य का रास्ता

सामाजिक कार्य की प्रकाश धोका द्वारा बनाई हुई परिभाषा बहुत सरल है – ‘अगर आपके अच्छे कर्मों की वजह से समाज, सामाजिक संस्था या किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति का भला हो, तो ये कहा जा सकता है की आपने सामाजिक कार्य या सोशल वर्क किया है।

वृद्धावस्था में सिर्फ शारीरिक बीमारियां ही नहीं बल्कि मानसिक बीमारियां भी खतरनाक साबित हो सकती है| व्यक्ति घर से जब बाहर निकलता है तो उसकी एक पहचान होती है| अगर कोई व्यक्ति अपनी पहचान ही भूल बैठे तो? मेमोरी लॉस से जुड़ी बीमारियां जैसे कि स्मृतिभ्रंश, औरअल्जाइमर्स में अक्सर ऐसा होता है| भारत में 40 लाख से भी अधिक बुजुर्ग स्मृतिभ्रंश का शिकार बने हैं| ऐसे लोग जब घर छोड़के जाते हैं, तो उनके साथ क्या होता होगा ये सोचकर रूह काँप उठती है|

प्रकाश धोका ऐसी करुणाजनक स्थिति में पाए गए स्मृतिभ्रंश के मरीजों की मदद करते है| ‘करुणालय’ (Karunalaya) संस्था में कुल 405 मरीज़ दाखिल हुए हैं जिनमें से 80 प्रतिशत मरीजों को मेमोरी लॉस हुआ है। अल्जाइमर्स (Alzheimer’s) या डिमेंशिया के कारण याद्दाश्त खोने की वजह सेइन मरीज़ों को अपने अतीत के बारे में कुछ भी याद नहीं आता है। अपनी पहचान भूलकर फुटपाथ पर बैठे ऐसे किसी भी व्यक्ति के बारे में जब प्रकाश धोका को पता चल जाता है, तो उस व्यक्ति का दाखिला तुरंत ही करुणालय में करवाया जाता है। ऐसे मरीजों की देखभाल वहां पर बहुत हीअच्छे से की जाती है।

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बातचीत के दौरान प्रकाश धोका ने मेमोरी लॉस (memory loss) की दिल दहलाने वाली घटनाएं हमारे साथ शेयर की। पुणे का एक बड़ा उद्योगपति, हरियाणा एक जवान लड़का इस बीमारी के चपेट में कैसे आए और उनको कैसे मदद मिली, इसकी जानकारी उन्होंने हमें दी| यह दोनों केसेसनीचे विस्तृत रूप में बताई गई है|

अमीर हो या गरीब, मेमोरी लॉस के आगे सब है नाकाम

एक वरिष्ठ नागरीक का करुणालय में दाखिला होने के 4 दिन बाद उनकी याद्दाश लौट आयी। उस व्यक्ति ने पूछा, “मैं यहाँ कैसे पहुंचा? मेरी गाड़ी है, बंगला है, मेरा बेटा इंजीनियर है और बहू डॉक्टर है। आप लोग मुझे यहाँ क्यों लाएं हैं?” बातों से तो ऐसा मालूम हो रहा था कि वह व्यक्ति बहुतअमीर है। फिर हम उस व्यक्ति को लेकर जब उसके मंचर में स्थित घर जा पहुंचे तो पता चला कि घर के सभी सदस्य चिंतित थे और उस व्यक्ति का इंतजार कर रहे थे। चार दिनों से घर में खाना नहीं बनाया गया था। भावविभोर होकर घर के लोगों ने कृतज्ञता व्यक्त की।
वह व्यक्ति वाकई में बहुत अमीर था पर मेमोरी लॉस के आगे उसकी एक न चली।

स्मृतिभ्रंश की वजह से जवान लड़के के 11 साल हुए बर्बाद

प्रकाश धोका ने स्मृतिभ्रंश की वजह से होने वाले खतरों को मध्यनजर रखते हुए ऐसे मरीजों को अच्छी देखभाल प्रदान करने की ओर जो पहल की है, वह सचमुच प्रेरणादायी है। उन्होंने स्मृतिभ्रंश की एक और सत्य घटना हमारे साथ शेयर की। एक जवान लड़का अपनी स्मृति खो चुका था। वह ५साल से करुणालय में रह रहा था और कुल 11 साल घरवालों से दूर रह रहा था। एकाएक उसकी याददाश्त लौट आयी और हमें पता चला कि वो हरियाणा से है और उसे मेमोरी लॉस तब हुआ जब इंजीनियरिंग कॉलेज के रैगिंग के दौरान उसे इलेक्ट्रिक शॉक दिया गया था।

दुर्भाग्यवश, स्मृतिभ्रंश के कई मामलों में जब मरीज को नशे की भी लत हो तो देखा गया है की ऐसे मरीज को घर से बेदखल भी किया गया है। कई जगह देखा गया है की आर्थिक कारणों से इलाज न करवा पाने पर भी कुछ मरीज़ घर से बाहर चले जाते हैं और स्मृति न होने के कारण घर लौट करनहीं आते। भारत में स्मृतिभ्रंश को बहुत हल्के में लिया जाता है| इसका शिकार बनने वाले लोगों की सेवा नहीं की जाती, बल्कि इसे उम्र के साथ आने वाली बीमारी मानकर नजरअंदाज किया जाता है|

दिमागी रूप से कमज़ोर बच्चों को जीने के काबिल बनाया

मस्तिष्क की बीमारी (neurological problem) हो तो अपने भी पराये बन जाते हैं। ऐसे लोगों को घर का बोझ माना जाता है और कई बार घर से बेदखल भी कर दिया जाता है| प्रकाश धोका ने ऐसे बच्चों के लिए जो कार्य किया है वो निश्चित रूप से प्रेरणादायी है| “गरीब माता-पिता अपने दिमागीरूप से कमज़ोर बच्चों का ख्याल नहीं रख पाते। उनकी देखभाल के लिए किसी एक को घर पर रहना पड़ता है, नहीं तो ये बच्चे घर पे तूफ़ान मचा देते हैं।” ये कहते समय प्रकाश धोका भावुक हो गए थे। उन्होंने कहा कि, ‘सेवदा मतिमंद विद्यालय’ में ४० बच्चे पढ़ते हैं और रहते भी है। और उन्हेंअपने पैरों पर खड़े रहने के काबिल बना कर ही यहाँ से अलविदा किया जाता है। वे बताते है, “मुझे ये कहते समय बहुत ख़ुशी होती है कि, जब इनका यहाँ दाख़िला होता है, तब ये बच्चे परिवार पर बोझ के रूप में यहाँ आते हैं और जब यहाँ से बाहर जाते हैं, तो परिवार का आधार बनकर जातेहैं।”

ज़रूरतमंदो की सुनो

ज़रूरतमंदों की मदद करना हर किसी का कर्तव्य है| प्रकाश धोका कहते हैं, “भगवान ने आपको क्या कुछ नहीं दिया? आप बदले में कुछ तो दो।” हर किसी को ज़रूरतमंदों के लिए कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। जितना आपने दिया वो दोगुना होकर आपको मिलता रहेगा।

जब हमने उनसे पूछा कि आप हैप्पी एजिंग की परिभाषा कैसे करेंगे? तो उन्होंने कहा, “अच्छे दोस्तों के साथ रहो जो आपको पॉजिटिव सोचने की सलाह दें, खुद हँसो और दूसरों को भी हँसाओ, ढ़ेर सारी खुशियां बांटो तभी आपको ख़ुशी मिलेगी। किसी लाफ्टर क्लब के साथ जुड़कर अपने ग़मोंको भूल जाओ। आप अगर खुश रहेंगे, तो आप स्वस्थ रहेंगे।”

प्रकाश धोका ने खुद को भुलाकर ज़रूरतमंदों के लिए जीना शुरू कर दिया है। आप भी स्वयं को ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करें। सामाजिक कार्य के लिए सिर्फ पैसे दान करने की नहीं बल्कि तरह तरह के मदद की जरुरत होती है। इसलिए अभी शुरुआत कर क्यों न जिंदगी को एक नयामोड़ दिया जाएं?

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