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शरीर के अस्वास्थ्य के चलते किडनी के गम्भीर विकारों का सामना करना पड़ता है| जिसका इलाज बहुत ही महंगा है| बुजुर्गों में मधुमेह, हाय ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक और अन्य गम्भीर विकारों के परिणामस्वरूप स्वास्थ्य को भारी मात्रा में हानि पहुँचती है| इसका नतीजा विकलांगता या मौत भी हो सकता है| इसलिए गम्भीर स्थिति में ट्रांसप्लांटेशन यानि की प्रत्यारोपण का सुझाव दिया जाता है|

अवयव प्रत्यारोपण आधुनिक विज्ञान का आविष्कार है जिसकी वजह से बहुत लोगों को जीवन भेंट में मिला है| किडनी प्रत्यारोपण का अनुपात अन्य अवयवों के प्रत्यारोपण की तुलना में ज्यादा है|

पिछले ४५ सालों से भारत में किडनी प्रत्यारोपण की योजना पर काम किया जा रहा है| यूएसए पहले स्थान पर अतः विश्व में भारत किडनी ट्रांसप्लांटेशन में दूसरे स्थान पर है| १९९५से मृतकों के किडनी का प्रत्यारोपण भी सम्भव हो पाया है| किडनी ट्रांसप्लांटेशन की शल्य-चिकित्सा सफल होने पर व्यक्ति को जीवनदान मिलता है| किडनी प्रत्यारोपण के जरूरत की वर्तमान स्थिति को समझते हुए कई सारे नागरीक उनकी किडनी दान करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं|

तथापि, अवयवों की मांग और आपूर्ति में काफी अंतर है| प्रत्यारोपण करने के लिए अवयवों का अभाव होना यह विश्व की सबसे बड़ी समस्या है| आमतौर पर मृतकों से किडनी की आपूर्ति होती है| परन्तु आयुमर्यादा बढ़ने की वजह से किडनी की वर्तमान मांग को पूरा नहीं किया जा सकता|

एक अभ्यास के अनुसार २०१३ में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में मृत होनेवाले नागरीकों की संख्या १,३७,५७२ थी| विश्व की तुलना में यह केवल १.१ प्रतिशत ही है| इसमें आधे से भी ज्यादा दुर्घटनाओं में मृतकों के सिर पर चोट थी| किडनी ऐसे मृतकों से भी ली जा सकती है जिनके सिर पर चोट आई हो| अगर इन मृतकों में से ५-१० प्रतिशत लोगों ने भी अवयव दान (ऑर्गन डोनेशन) करने का निर्णय लिया होता तो मांग और आपूर्ति के अंतर को मिटाया जा सकता था| तथापि, मांग और आपूर्ति के लक्ष्य तक पहुंचते समय हमे कई सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है|

किडनी प्रत्यारोपण के सामने खड़ी समस्याएं

एक अभ्यास के अनुसार भारत में मृतक किडनी दाताओं की संख्या दस लाख में ०.३४ इतनी ही है| अगर बाकि देशों से तुलना की जाए तो यह संख्या बहुत ही कम है| भारतीय परम्पराओं के वश में आकर लोग अवयव दान करने के लिए झिझक जाते हैं| कई भारतीय नागरीकों को अवयव दान की अहमियत पता नहीं है| वास्तव में देखा जाए तो, ८०.१ प्रतिशत लोगों को अवयव दान के बारे में जानकारी नहीं है| ६३.४ प्रतिशत लोग धार्मिक श्रद्धा और अंधविश्वास के वश में आकर अवयव दान नहीं करते| भारतीय आरोग्य प्रणाली पर विश्वास न होने की वजह से ४०.३ प्रतिशत नागरीक अवयव दान करने से हिचकिचाते हैं|

पढ़े-लिखे नागरीकों को बाकी लोगों को यह सिखाना चाहिए कि ब्रेन डेड (निष्क्रिय मस्तिष्क) मरीजों की जान को एक किडनी दान करने से कोई खतरा नहीं है|

अस्पताल के कर्मचारियों में प्रशिक्षण का एवं शल्य-चिकित्सा के बाद वैद्यक सम्बन्धी सुविधाओं का अभाव ग्रामीण इलाके में प्रत्यारोपण के बारे में गलत छवि को दर्शाता है| समाचारों में या मीडिया में किडनी दान करने के बारे में जो नकारात्मकता फैलायी जाती है उस वजह से ग्रामीण इलाकों से लोग अवयव दान के लिए आगे नहीं बढ़ते|

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मन में है विश्वास

किडनी दान के मार्ग में इतनी सारी समस्याएं होने के बावजूद भी मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर कम करने का प्रयास भारत सरकार द्वारा जारी है| दान से प्रत्यारोपण तक की इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर में समन्वयकों की मदद से भारत सरकार इस लक्ष्य को पूरा करने की कोशिश कर रही है| इसकी वजह से पिछले कुछ वर्षों में भारत में किडनी दान की तादाद बढ़ गई है|  MOHAN (मल्टी ऑर्गन हार्वेस्टिंग एंड नेटवर्किंग) यह एक एनजीओ है जो १९९७ से इस क्षेत्र में अच्छा योगदान दे रही है| इस एनजीओ के द्वारा सन २००० में INOS (इंडियन नेटवर्क फॉर ऑर्गन शेयरिंग) किडनी दान की प्रक्रिया का केंद्रीकरण किया गया| स्वास्थ्य चिकित्सा केंद्र पर भी प्रत्यारोपण के लिए समन्वयकों की नियुक्ति की गयी है ताकि वे परिवारों को अवयव दान की अहमियत क्या है इसके बारे में जानकारी दे सकते हैं| परिवार के मृतक सदस्य के अवयव दान का प्रबंध करने के लिए अन्य सदस्यों की अनुमति लेने का काम भी इन समन्वयकों को सौंपा गया है|

NOTTO (नैशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन) इस राष्ट्रीय संस्था का निर्माण भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के डिरेक्टोरेट जनरल हेल्थ सर्विसेस द्वारा किया गया है| दी नैशनल ह्यूमन ऑर्गन एंड टिश्यू रिमूवल एंड स्टोरेज नेटवर्क यह इस संस्था का उपविभाग है| NOTTO द्वारा अवयव दान से लेकर प्रत्यारोपण तक सारी प्रक्रियाओं का केंद्रीय स्तर पर नियंत्रण किया जाता है| इन प्रक्रियाओं में समन्वय, नेटवर्किंग, प्राप्ति, वितरण, अवयव सुरक्षा, सुरक्षित और जलद ट्रांसपोर्ट और अंत में सुरक्षित प्रत्यारोपण आदि मुख्य क्रियाएं समाविष्ट हैं|

अवयव प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर्स (जहां प्रत्यारोपण के लिए अवयवों को ले जाने वाले वाहनों को नहीं रोका जाता) और टिश्यू बैंक्स (जहां किडनी और अन्य अवयवों को कम तापमान में सुरक्षित रखा जाता है) का भी निर्माण किया जा रहा है|

निष्कर्ष

भारत में किडनी प्रत्यारोपण धीरे धीरे बढ़ता जा रहा है| भारत सरकार और कुछ एनजीओज द्वारा इस स्थिति में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं, उनकी वजह से ज्यादा से ज्यादा नागरीक अवयव दान करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं| इससे मांग और आपूर्ति के अंतर को जल्द ही मिटाया जा सकता है|

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