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भारत में किड़नी के मरीजों की संख्या सुनिश्चित करने के लिए कोई सर्वेक्षण तो नहीं किया गया है| परन्तु एक अभ्यास के अनुसार जिन नए मरीजों को किडनी के विकार के आखिरी अवस्था में पाया गया है या जिन्हे डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट का सुझाव दिया गया है ऐसे मरीजों की संख्या सालाना एक लाख से भी ज्यादा है| भारत में किड़नी की समस्या निर्माण होने का कारण है मधुमेह और हृदयविकार|

रक्त को फ़िल्टर करके ह्रदय तक अच्छा रक्त पहुँचाने का काम करने में अगर किडनी विफल हो रही है तो इस बात को गम्भीरता से लेना जरुरी है| बुजुर्गों में किड़नी की उम्र बढ़ने के कारण भी किड़नी उसका काम करने में विफल हो सकती है| हालाँकि, साल में कम से कम एक बार कुछ टेस्ट के जरिए हम किड़नी के सक्रियता की जाँच करा सकते हैं| आइये, लेते हैं जानकारी इन दो आसान टेस्ट्स के बारे में:

1. एसीआर (एल्ब्युमिन टू क्रिएटिनाइन रेशो)

एसीआर टेस्ट के दौरान व्यक्ति के मूत्र का परीक्षण किया जाता है| इस परीक्षण में एल्ब्युमिन के अनुपात में क्रिएटिनाइन की मात्रा मूत्र में कितनी है, इस बात की जाँच की जाती है| एल्ब्युमिन एक प्रकार का आवश्यक प्रोटीन है जिसको लिवर द्वारा निर्मित किया जाता है| परन्तु यह प्रोटीन रक्त में मौजूद होना चाहिए, न की मूत्र में| इसलिए अगर एसीआर रिपोर्ट में एल्ब्युमिन पाया गया तो आपकी किडनी ठीक से काम नहीं कर रही है| इसलिए तुरंत ही वैद्यक चिकित्सा की आवश्यकता है|

2. जीएफआर (ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट)

जीएफआर टेस्ट के दौरान व्यक्ति के रक्त की जाँच की जाती है| अगर आपके रक्त में क्रिएटिनाइन पाया गया तो समझ लीजिए की आपकी किडनी ठीक तरीके से काम नहीं कर रही है| क्रिएटिनाइन एक रासायनिक अपशिष्ट है जिसे किडनीद्वारा फ़िल्टर किया जाना बहुत आवश्यक है| किडनी का काम है, खून से क्रिएटिनाइन को हटाना| रक्त में पाई गयी क्रिएटिनाइन की मात्रा आपके किडनी के विकार की गम्भीरता की कल्पना देती है|

एसीआर और जीएफआर टेस्ट्स इतने महंगे नहीं है| आप साल में एक बार भी अगर ये टेस्ट्स कराएं तो किडनी का विकार प्रारंभिक अवस्था में ही पहचाना जा सकता है और उसपर जल्दी इलाज भी किया जा सकता है|

 

Ask a question regarding इन दो किफायती टेस्ट्स के जरिए सुनिश्चित करें किडनी का स्वास्थ्य 

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