शाश्वत आयुर्वृद्धि के बारे में डी सुरेश ने दिए ये ७ सुझाव

0
5 MIN READ

इस पृथ्वी ने पूरी मनुष्यजाति को अनेक प्रकार के प्राकृतिक संसाधन दिए| प्रगति की पगडंडी पर चलते हुए मानव ने कई चीजों की खोज की जिनकी वजह से मनुष्य का जीवन आसान तो हो गया पर साथ ही साथ पृथ्वी पर निसर्गतः पाए जाने वाले संसाधनों की बेहद हानी भी हो गयी| इस पर्यावरण दिन के अवसर पर हैप्पी एजिंग की तरफ से हम एक ऐसे व्यक्ति से मिले जिन्होंने अपने जीवन में शाश्वत आयुर्वृद्धि का अवलंब कर कई अक्षय ऊर्जा देनेवाले संसाधनों को अपनाया| 

चेन्नई जैसे एक बड़े शहर में, एक घर है जो कि जंगल की गोद में बसा है| एक ऐसा घर जो पूरी तरह से आत्मनिर्भर है| जिसे कोई भी अनवीनीकरणीय संसाधन की जरुरत नहीं पड़ती| क्या आप यकीन करेंगे? हाँ, पर्यावरणीय समस्याओं पर केवल बाते करके नहीं परन्तु उनका हल ढूँढ़के सोलर सुरेश कहलाए जाने वाले डी सुरेश ने अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल रोजाना कामकाजो में कर दिखाया|  

सोलर सुरेश ने १९६७ में आईआईटी, मद्रास से स्नातक स्तरीय मेकैनिकल इंजीनियरिंग तथा १९७० में आईआईएम, अहमदाबाद से स्नातकोत्तर अभ्यास को पूरा किया| १५ वर्षों के लिए कार्पोरेट क्षेत्र और २० साल टेक्सटाइल इंडस्ट्री में एमडी, सीईओ के तौर पर उन्होंने पदभार संभाला| साथ ही SAKS Ancillaries Ltd की स्‍थापना में अपने उद्यम संबंधी ज्ञान का उपयोग किया। इस नए उद्यम को अच्छे स्थान पर ले जाकर उन्होंने टेलीकम्युनिकेशन की दुनिया में कदम रखा और ‘लास्ट-माइल कनेक्टिविटी स्पेस’ की अगुआई की| ४५ साल के बाद रिटायरमेंट लेकर अक्षय ऊर्जा देनेवाले वाले ६ उपकरण उन्होंने अपने घर में लगवाएँ| डी सुरेश और उनका परिवार हम सबके लिए एक मिसाल है| 

इको-फ्रेन्डली, आत्मनिर्भर जीवन और शाश्वत विकास को अपनाने के लिए तथा अक्षय ऊर्जा निर्माण के लिए ७५ वर्षीय डी सुरेश ने शाश्वत आयुर्वृद्धि के लिए दिए है ये ७ सुझाव: 

रेनवॉटर हार्वेस्टिंग

1. “पानी  एक संसाधन के रूप में भारत में  अधिक मात्रा में पाया जाता है, किन्तु  पानी  की रक्षा कैसे करनी है  इसका अभ्यास हमें करना चाहिए ” 

सोलर सुरेश ने कहा “पहले के ज़माने में लोग पानी बड़े बड़े टंकियों में इकट्ठा किया करते थे| मैने आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके पानी की रक्षा करना शुरू किया|” 
 
रेनवॉटर हार्वेस्टिंग का मतलब है, मानसून के दौरान बारिश के पानी को इकट्ठा करके रखना ताकि हम उसे पानी की कमी होने पर या सूखा पड़ने पर इस्तेमाल कर सके| 
चेन्नई एक ऐसा शहर है जहां पानी की कमी की समस्याओं का सामना लगातार करना पड़ता है| इसी समस्या का समाधान ढूँढते हुए डी सुरेश ने अपने घर के छत पर गिरने वाला पानी एक कुएँ में इकट्ठा किया| फिल्ट्रेशन करके उस पानी को शुद्ध बनाके पीने तथा घर के कामकाजों के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया| निसर्ग ने भी सुरेश की मेहनत का अच्छा फल दिया| पिछले २५ साल वह कुआँ सूखा नहीं है| 

सोलर इलेक्ट्रिसिटी

2. “भारत जैसे प्रगत राष्ट्र में पानी गर्म करने के अलावा भी अन्य कामों में सोलर सिस्टम का अच्छा उपयोग किया जाना चाहिए “

डी सुरेश के जर्मनी यात्रा के दौरान सोलर इलेक्ट्रिसिटी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की जर्मन तकनीक से वे प्रभावित हुए| जर्मनी में सूरज की रौशनी का अभाव होते हुए भी लोग ऐसा कर रहे है तो भारत में हम क्यूँ नहीं कर सकते यह विचार उनके दिमाग में आया| चेन्नई में तो भारी मात्रा में सूरज की रौशनी मिलती है| परन्तु, सोलर इलेक्ट्रिक पावर प्लान्ट लगवाना उनके लिए मुश्किल था क्यूंकि व्यावसायिक स्तर पर इसका इस्तेमाल होता था पर घरेलु स्तर पर इसे लगवाने के लिए कारीगर नही मिल पा रहा था|

इस  सयंत्र को लगवाने के लिए सुरेश को ४ से ५ सालों तक रुकना पड़ा| उसके बाद एक कारीगरने सन २०१२ में १ किलोवैट का सोलर पावर  प्लान्ट लगवाने में उनकी मदद की| उन्होंने  टीव्ही, लाइट, फैन, रेफ्रिजरेटर जैसे इलेक्ट्रानिक उपकरणोंको सोलर प्लान्ट के साथ जोड़ा| २०१५ में उन्होंने संयंत्र की क्षमता बढाकर ३  किलोवैट करवाई| अब उन्होंने २ इन्वर्टर एयर कंडीशनर्स भी उस प्लान्ट से जोड़े है| 

बायोगैस प्लान्ट 

3. “स्वास्थ्य आज एक जरुरी विषय बन चुका है | ठोस कचरे के अयोग्य व्यवस्थापन की वजह से कई तरह की बीमारियाँ फ़ैल रही है | बायोगैस जरूर इस परिस्थिति का योग्य हल साबित हो सकता है 

गाय का गोबर भारतीय देहाती इलाकों में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होता है| इस तकनीक को योग्य तरह से समझते हुए ठोस कचरे से बायोगैस का उत्पाद करने की योजना सुरेश ने बनाई| बायोगैस बनाने के लिए जो बैक्टीरिया आवश्यक होते है वे गाय के गोबर में मौजूद होते है| इस वजह से सुरेश को पहली बार बायोगैस प्लान्ट में कचरे की बजाय गोबर का इस्तेमाल करना पड़ा| अब जब भी वे ३ से ४ किलोग्राम का रसोई का कचरा बायोगैस की टंकी में डालते है लगभग १४ से १५ लिटर का बायोगैस बन जाता है जो कि एक घरेलु एलपीजी सिलिंडर के बराबर है| बायोगैस के साथ पेड़ पौधों के लिए खाद भी बन जाता है| इस प्रकार रसोई के कचरे से दो महत्वपूर्ण चीजों का उत्पादन किया जा सकता है| 

१. बायोगैस 

२. जैविक खाद

टेरेस-किचन गार्डन

4. “खुद का खाना खुद उगाना, वो भी अपनी आँखों के सामने यह एक बहुत ही अनूठी बात है “

रसोई में खाना पकाने के लिए जिन चीजोंकी जरुरत है वे सभी जरूरते डी सुरेश अपने टेरेस किचन गार्डन की मदद से पूरी करते हैं| बायोगैस के साथ बना हुआ जैविक खाद वो अपने इस बगीचे में इस्तेमाल करते है| उन्होंने जो पौधे लगाएँ हैं उनमें शिमला मिर्च, कद्दू, भिंडी, टमाटर, बीट, गाजर, मूली, पालक, पुदीना आदी सब्जियों का समावेश है|  

स्वयंनिर्मित जंगल

5. ” खुदकी बसाई हुई हरियाली की अलग दुनिया में  ख़ुशी से रहो “

चेन्नई की एक जानी मानी सोसायटी में रहने के बावजूद भी डी सुरेश स्वयंनिर्मित जंगल की दुनिया में खोए रहते है| लगभग २५ साल पहले उन्होंने बम्बू, नीम, बादाम और अन्य पेड़ लगाए थे| आज उनके घर के बगल में इन पेड़ों की एक बड़ी घनी छाँव बन गयी है जिसकी वजह से वे चेन्नई का हिस्सा होने के बावजूद भी शहरी चहल-पहल से दूर शान्तिपूर्ण जीवन का आनंद ले रहे है| 

वातावरणीय हवा से मिलता है पेय जल

6.”दूसरे देशों में इस्तेमाल की जानेवाली तकनीकों को अपनाकर हम भारत की समस्याओंका हल ढूँढ सकते है”

वातावरणीय हवा से पेय जल बनाने की यह तकनीक इस्रायल से प्रेरित होकर डी सुरेश ने अपनाई| प्राकृतिक संसाधन कम पैमाने पर होने के बावजूद भी इस्रायल आज एक आत्मनिर्भर देश बन गया है| 
पेय जल बनाने के इस संयंत्र को लगवाने के लिए ४० हजार रुपयोंका खर्चा हुआ| डी सुरेश ने कहा कि, ‘इस संयंत्र द्वारा वे दिन में २५ लीटर पानी का उत्पाद कर सकते है| अगर हिसाब लगाया जाए तो बड़े ही सस्ते दाम में यानी कि, १ लीटर के लिए  लगभग ५० पैसे इतनाही खर्चा इसके लिए आता है| इलेक्ट्रिसिटी का उपयोग करके यह संयत्र चलाया जा सकता है| मेरे लिए तो ये बहुत ही फायदेमंद है क्यूंकि मैंने इसे सोलर पावर सयंत्र से जोड़ा है| 

भविष्यकालीन योजनाएँ

7. ” हर समस्या का समाधान होता है, इसलिए समस्या मत बदलें, हल ढूँढे “ 

भविष्यकालीन योजनाओंको मध्यनजर रखते हुए डी सुरेशने दूषित पानी को शुद्ध करने,  मानवी अपशिष्ट से बायोगैस बनाने तथा सौर ऊर्जा पर चलनेवाली गाड़ियाँ बनाने की योजनाओं को हमारे सामने रखा| उन्होंने कहा, अगर हम बिजली जैसे अनवीनीकरणीय संसाधन का इस्तेमाल कर के कार को चार्ज कर रहे है तो यह सिर्फ समस्या को बदलने जैसा हुआ| सौर ऊर्जा पर चलनेवाली कार में बैटरी चार्ज करने के लिए सोलर इलेक्ट्रिसिटी का उपयोग किया जा सकता है और यही इस समस्या का योग्य हल है| अगर हम सारी कड़ियाँ मिला दे तो हमें ये बात समझ आएगी, की इस आत्मनिर्भर घर बनाने की संकल्पना की जड़ है ‘पर्यावरण’| सोलर सुरेश ने उपयोग में लाए हुए सारे उपकरणों की जानकारी हमें भी किताबों में दी गयी थी, फर्क इतना है कि डी सुरेश ने इस विज्ञान का उपयोग सही तरीके से किया| सुरेश कहते है कि, ‘भारत में तकनीकी समस्याओं से भी बड़ी है रवैय्ये की समस्या जिसकी वजह से हम भारतीय नागरिक पीछे रह जाते हैं|’ 

अंत में उन्होंने एक महत्वपूर्ण सन्देश देते हुए कहा, “हमें आनेवाली पीढ़ियोंके लिए पृथ्वी की इस दौलत को बरक़रार रखना चाहिए|” 

“Ask not what your country can do for you, ask what you can do for your country!” – John F. Kennedy

Also read this here in EnglishWatch: 7 Learnings on ‘Sustainable Aging’ by D Suresh

Ask a question regarding शाश्वत आयुर्वृद्धि के बारे में डी सुरेश ने दिए ये ७ सुझाव

An account for you will be created and a confirmation link will be sent to you with the password.

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here